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अपनों में ही अपनापन ढूंढ रहा हूँ मैं सालों से

अपनों में ही अपनापन ढूंढ रहा हूँ मैं सालों से, मतलब के हैं सब यार यहाँ ये भी सबक मिला घरवालों से  क्या उम्मीद रखु मंदिर, गिरजा और शिवालयों से, जब बाकी रही न जनने वालों से  अपनों में ही अपनापन ढूंढ रहा हूँ मैं सालों से थक कर यूँही मर जाऊंगा, कोशिश करो न भालों से  जब मर जाऊं तब खूब झगड़ना मेरी तस्वीर टंगी दीवारों से अपनों में ही अपनापन ढूंढ रहा हूँ मैं सालों से